तू नहीं है तेरी यादों के वो भार तो हैं

अकेलेपन में सताने को ढेरों यार तो हैं
जब दीवार पर तंगी चाबियाँ तेरी पायल की खनक सुनाती हैं
प्याली में पड़ी चाय तेरी गर्म साँसों को रिहा कर देती है
वो पर्दा भी हवा में झूल तेरी लहराती जुल्फों की याद दिला देता है
कभी कभी ये चुल्हा भी तेरी तरहा नखरे करके जलने से मन करता है
अब तो ये छत भी रोते हुए मेरा साथ देने लगी है
मैं कभी अकेला नहीं पड़ा
अकेलापन मुझे कभी अकेला नहीं पड़ने देता

तू नहीं है तेरी यादों के वो भार ज़रूर हैं

अकेलेपन में सताने को ढेरों यार तो ज़रूर हैं
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